राजस्थान की चित्रकला शैली की विशेषताएँ

राजस्थान में चित्रकला की शुरूआत राणा कुम्भा के शासनकाल से हुई। राजस्थान का प्रथम चित्रित ग्रंथ “श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्ण“  हैं। जिसकी रचना 1261 ई़ में मेवाड़ के तेजसिंह के शासन काल में हुई। राजस्थान की चित्रकला पर आनन्द कुमार स्वामी ने “राजपुत पेटिंग“ नामक पुस्तक में प्रथम बार प्रकाश डाला व राजस्थानी चित्रकला का सर्वप्रथम वैज्ञानिक विभाजन भी 1916 में किया। राजस्थान की आधुनिक चित्रकला की शुरूआत करने का श्रेय कुन्दनलाल मिस्त्री को जाता हैं। राजस्थान में भित्ति चित्रों को चिरकाल तक जीवित रहने के लिए एक आलेखन  पद्वति हैं। जिसे अरायश या आला-गीला पद्वति कहते हैं। जिसे शेखावाटी  में पणा कहते हैं। राजस्थान का शेखावाटी क्षैत्र व बूंदी क्षैत्र भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्व हैं तथा आॅपन आर्ट गैलेरी के लिए शेखावाटी क्षैत्र प्रसिद्व हैं।

मेवाड़ शैलीः-

इसे उदयपुर शैली भी कहते हैं। यह राजस्थान की मुल व सबसे प्राचीन शैली हैं। इस शैली का विकास राणा कुम्भा के शासन काल में हुआ। लेकिन इस शैली का स्वर्णकाल जगतसिंह प्रथम का काल कहलाता हैं। जगतसिंह प्रथम ने राजमहल में ‘चितेरों की ओवरी’ नाम से चित्रकला का विद्यालय खोला। मेवाड़ चित्रकला शैली को सुव्यवस्थित रूप देने का श्रैय महाराजा जगतसिंह को दिया जाता हैं। जिसके काल में मेवाड़ में रागमाला, रसिक प्रिया, गीत-गोविंद जैसे विषय लघु चित्रों पर चित्रण किया। कलीला-दमना इस चित्र शैली के दो पात्र हैं। साहिबद्विन व मनोहर मेवाड़ शैली के प्रसद्वि चित्रकार हैं। तथा 1605 में अमरसिंह प्रथम के समय चित्रित रागमाला  का चित्रकार निसारूद्विन का संबध मेवाड़ शैली से हैं। वर्तमान में यह ‘रागमाला’ का चित्र दिल्ली के अजायबघर में सुरक्षित हैं।

चावण्ड शैलीः-

इस शैली की चित्रकला को अमरसिंह प्रथम (स्वर्ण काल) व प्रताप के शासनकाल में शुरू हुई। और इन्हीं के काल में प्रसिद्व चितेरे नासीरूद्वीन ने ‘रागमाला’ का चित्रण किया।

किशनगढ़ (अजमेर) शैलीः-

इसे कागजी शैली भी कहते हैं। यह शैली कांगड़ा शैली व ब्रज साहित्य से प्रभावित हैं। यह शैली नारी के सौन्दर्य पर आधारित हैं। इस शैली का स्वर्णकाल सांवतसिंह (नागरीदास) का शासनकाल था। नागरीदास ने अपनी प्रेमिका रसिक प्रिया (बणी-ठणी) का चित्र मोरध्वज निहालचन्द नामक चित्रकार से बनवाया। इस शैली का प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिक्सन व फैयाज अलि को जाता हैं। एरिक डिक्सन ने इसे भारत की मोनालिसा कहा। 5 मई 1973 को बणी-ठणी पर डाक टिकिट जारी हुआ। अमरचन्द द्वारा चित्रित चाँदनी  रात की संगोष्ठी किशनगढ़ शैली का प्रमुख विषय हैं। तथा इस शैली में केले के वृक्ष को चिन्हित किया गया हैं।

बूँदी शैलीः-

इसे पशु-पक्षियों की शैली भी कहते हैं। इसका स्वर्णकाल राव सर्जनसिंह हाड़ा के शासन काल को माना जाता हैं। राजस्थानी चित्रकला का मुख्य प्रारम्भिक केन्द्र व राजस्थानी संस्कृति का पूर्ण चित्रण, पशु-पक्षियों के चित्र इसी शैली की विशेषताएँ हैं। महाराव उम्मेद सिंह के शासन में निर्मित चित्रशाला संग्रहालय बूँदी शैली का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जिसे भित्ति चित्रों का स्वर्ग कहते हैं। रामलाल व सुर्जन बूँदी राज्य के प्रमुख चित्रकार हैं।

जोधपुर शैलीः-

इस शैली का स्वर्णकाल मालदेव के शासन काल को कहा जाता हैं। इस शैली पर नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव हैं। रेत के टीले, ऊँट, कौए, चिंकारा, घोड़े, छोटी-छोटी झाड़ियाँ आदी इस शैली की विशेषताएँ हैं। शिवदास एवं देवदास इस शैली के प्रमुख कलाकार हैं।

जयपुर शैलीः-

इस शैली में मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव देखा जाता हैं। इसलिए इसमें वात्स्यायन कृत कामसूत्र, फकीरों को भिक्षा देती नारी, कुरान पढ़ती शहजादी, लैला-मजनू, हाथी-घोड़ों के दंगल के चित्र मिलते हैं। इस शैली का स्वर्ण काल सवाई प्रतापसिंह के शासन को माना जाता हैं। ‘आदमकद पोट्रेट’ जयपुर शैली की विशेषता हैं। अतः इस शैली में साहिब राम नामक चित्रकार ने ईश्वरी सिंह का राजस्थान में प्रथम आदम कद चित्र बनाया जो वर्तमान में सिटी पैलेस (जयपुर) में हैं। जयपुर राज्य में कलाकार जहाँ चित्र और लघु चित्र बनाते थे जो सुरतखाना कहलाता हैं।

अलवर शैलीः-

विनयसिंह का शासनकाल इस शैली का स्वर्णकाल कहलाता हैं। इस शैली पर ईस्ट इंडिया का सर्वाधिक प्रभाव रहा। इसलिए  इसमें वन, उपवन,कुंज विहार, अश्लील नृत्यांगना, वेश्याओं आदि के चित्र मिलते हैं।

बीकानेर शैलीः-

इस शैली का स्वर्णकाल  अनूपसिंह का काल कहलाता हैं। इस शैली के चित्रकार चित्र बनाकर अपना नाम व तिथि अंकित करते हैं। अतः कलाकार उस्ताद कहलाते हैं। रामलाल, अली राजा एवं हसन जैसे विख्यात चित्रकारों का त्रिगुट बीकानेर चित्रशैली से सम्बधित हैं। ऊँट की खाल पर चित्रांकन इस शैली की विशेषता हैं।

जैसलेमेर शैलीः-

इस शैली का स्वर्णकाल मूलराज द्वितीय के शासनकाल में था। लोद्रवा की राजकुमारी मूमल का चित्र जैसलमेर चित्रकला शैली का प्रमुख विषय हैं। मरू महोत्सव जैसलमेर में आज भी ‘मिस मुमल प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जाता हैं।

नाथद्वारा (राजसमन्द) शैलीः-

इसे वल्लभ शैली भी कहते हैं। इसमें कृष्ण की बाल लीलाएँ, कृष्ण यशोदा के चित्र, गायों, केले के वृक्ष आदि का चित्रण मिलता हैं। तथा इस शैली का प्रारम्भ व स्वर्णकाल राजसिंह के शासन काल को माना जाता है। यह शैली उदयपुर शैली व ब्रज शैली का मिश्रण हैं। नाथद्वारा शैली के प्रख्यात चित्रों का विषय श्री नाथ जी के सहस्त्रा स्वरूप है, तो नाथद्वारा की ‘पीछवाईयाँ’ भित्ति-चित्र व ‘हवेली संगीत’ प्रसिद्व हैं।

कोटा शैलीः-

इसे शिकार शैली भी कहते हैं। महाराव रामसिंह के शासन काल को माना जाता है। इस शैली पर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव अधिक पड़ा हैं। युद्व व रानियों के शिकार खेलते हुए दृश्य, दरबार का दृश्य आदि इस शैली की विशेषताएँ हैं। नूर मोहम्मद कोटा राज्य का प्रमुख चित्रकार था।

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