Contents

राजस्थान की प्रमुख हस्तकलाएँ

जववहारात का कार्य ‘हस्तशिल्प’ की श्रेणी में आता हैं। राजस्थान की हस्तशिल्प वस्तुओं को राजस्थान लघु उधोग निगम राजस्थली ब्रांड के नाम से विपणन करता हैं। जो जयपुर में स्थित हैं। हस्तशिल्पियों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उदयपुर से दूर 13 किमी. शिल्पग्राम की स्थापना की गई। ‘हैण्डलूम मार्क’ शिल्पकला की प्रमाणिकता बताता हैं। राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान ने भौगौलिक सूचक पद में शिल्पकला में ‘ब्लू पाॅटरी’ जयपुुर तथा ‘चिकनी मिट्टी के उधोग’ उदयपुर का हैं। राजस्थान राज्य करघा विकास निगम लिमिटेड की स्थापना 1984 में की गई। कला धरोहर का संरक्षण तथा राज्य के कलाकारों के प्रोत्साहन के लिए राष्ट्रपति ने जयपुर में अप्रैल 1993 में जवाहर कला केन्द्र का उद्घाटन किया।

थेवा कलाः-

रंगीन काँच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन व नक्काशी को ही थेवा कला कहते हैं। प्रतापगढ़ इसका प्रमुख केन्द्र हैं। नाथूजी सोनी इस कला के जन्मजाता हैं। महेश राज सोनी को थेवा कला के लिए 2015 में ’पदमश्री’ दिया गया। जस्टिन वकी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय किया। थेवा कला में आभूषण तैयार होते हैं।

टेराकोटाः-

मिट्टी को पकाकर उसकी मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। राजसमन्द का मोलेला गाँव इसके लिए प्रसिद्व हैं। मोहनलाल कुमावत को इसके लिए पदमश्री मिल चुका हैं। हनुमानगढ़ के बड़ोपल से प्राचीन टेराकोटा प्राप्त हुई हैं।

रंगाई-छपाईः-

अ. अजरक प्रिंटः-

इस प्रिंट का अधिक प्रभाव बाड़मेर में हैं। नीले व लाल रंग का प्रयोग अधिक किया जाता हैं। तथा ज्यामितिय अंलकरण बनाये जाते हैं। ये तुर्की शैली से प्रभावित हैं।

ब. मलीर प्रिंटः-

ये भी बाड़मेर कि प्रसिद्व हैं। काले व कत्थैई रंग का प्रयोग अधिक किया जाता हैं

स. सांगानेरी प्रिंटः-

यह जयपुर सांगानेर की प्रसिद्व हैं। इसमें काले व लाल रंग का प्रयोग अधिक किया जाता हैं। मुन्नालाल गोयल ने इसे अंतराष्ट्रिय दर्जा दिलाया।

द. बगरू प्रिंटः-

यह बगरू-जयपुर की प्रसिद्व हैं। इसमें प्राकृतिक रंगो का प्रयोग अधिक किया जाता हैं। तथा बेल-बूटों की भी छपाई कि जाती हैं।

य. जाजम/दाबु प्रिंटः-

ये अकोला चितौड़गढ़ की प्रसिद्व हैं। इसमें गाड़िया लौहारों के महिलाओं के कपड़े बनाये जाते हैं।

र. बंधेज प्रिंटः-

ये जयपुर की प्रसिद्व हैं।

ल. लहरिया प्रिंटः-

ये जयपुर व पाली की प्रसिद्व हैं।

मीनाकारीः-

सोने में रंग भरने की कला को ही मीनाकारी कहते हैं। जयपुर इसका प्रमुख केन्द्र हैं। मानसिंह इसके कलाकारों को लाहौर से लेकर आये थे। कुदरत सिंह को इसके लिए पदमश्री मिल चुका हैं।

तारकशीः-

चाँदी के पतले तारों से जेवर बनाये जाते हैं। नाथद्वारा इसका प्रसिद्व केन्द्र हैं।

ब्लू पाॅटरीः-

चीनी मिट्टी के सफेद बर्तनों पर नीला रंग भरने की कला को ही ब्लू पाॅटरी कहते हैं। जयपुर  इसका प्रसिद्व केन्द्र हैं। यह रामसिंह द्वितिय के समय जयपुर में लोकप्रिय हुई। इस कला के कृपाल सिंह शेखावत को इसके लिए पदमश्री मिल चुका हैं। कृपाल सिंह ने नीले रंगो के अलावा अन्य रंगो का भी प्रयोग किया है। जिसे कृपाल शैली कहा गया हैं। तथा ब्लेक पाॅटरी कोटा की प्रसिद्व हैं।

बदलेः-

जस्ते के बने बर्तन जिन पर कपडे़ या चमड़े की परत चढ़ा दी जाती हैं। इनमें पानी ठंडा रहता हैं। इसका प्रमुख केन्द्र जोधपुर में हैं। कठपुतली उधोगः- कठपुतली उधोग उदयपुर में प्रसिद्व हैं। भारतीय लोक-कला मंडल (उदयपुर) कठपुतली खेल को प्रोत्साहन देता हैं। 1952 में देवीलाल सामर ने भारतीय लोक कला मंडल की स्थापना कि थी।

जस्ते की मूर्तिः-

इसका प्रमुख केन्द्र जोधपुर हैं।

रमकड़ा उधोगः-

गलियाकोट (डूंगरपूर) इसका प्रमुख केन्द्र हैं।

काष्ठ कलाः-

बस्सी (चितौड़गढ) में देवताओं के लकड़ी के मन्दिर बनाये जाते हैं। जिसे ही काष्ठ कला कहते हैं।

संगमरमर कि मूर्तियाः-

ये जयपुर की प्रसिद्व हैं। इसके लिए अर्जुनलाल प्रजापत  को पदमश्री मिल चुका हैं।

दरियाँः-

टाँकला नागौर की प्रसिद्व हैं। तथा खालावास जोधपुर और लवाण दौसा में भी दरियों का कार्य होता हैं।

गलीचे/नमदेः-

टांेक व जयपुर के गलिचे प्रसिद्व हैं। तथा बीकानेर और जयपुर की जेलों में बनाये जाने वाले गलीचे भी प्रसिद्व हैं। जो केदियों द्वारा बनाये जाते हैं।

कोटाडोरिया/मंसूरियाः-

ये कैथून कोटा का प्रसिद्व हैं। मांगरोल बांरा की श्रीमती जैनब इसकी प्रमुख कलाकार हैं।

गोटा-किनारीः-

सीकर के खण्डेला में इसका प्रमुखता से कार्य किया जाता हैं। किरण, बांकड़ी, लप्पा, लप्पी आदि गोटा के प्रकार हैं।

पेचवर्कः-

इसका कार्य शेखावाटी क्षेत्र में किया जाता हैं।

मिररवर्कः-

इसका कार्य जैसलमेर क्षैत्र में किया जाता हैं।

लाख का कामः-

इसका कार्य जयपुर में किया जाता हैं।

हाथी-दाँत का कामः-

इसका कार्य जोधपुर में किया जाता हैं।

नक्काशीदार फर्निचरः-

बाड़मेर का प्रसिद्व हैं।

खेल का सामानः-

हनुमानगढ़ जिले में खेल के सामान का उत्पादन किया जाता हैं।

कृषि के औजारः-

लकड़ी के औजार नागौर के प्रसिद्व है तथा लोहे के औजार गंगानगर के प्रसिद्व हैं।

मोजड़ीः-

भीनमाल तथा बड़गाँव जालौर के प्रसिद्व हैं।

बिड़ी उधोगः-

टोंक में मयूर बीड़ी कारखाना हैंे।

तलवार का कार्यः-

तलवार का कार्य सिरोही क्षैत्र में किया जाता हैं।

कोफ्तागीरीः-

लोहे मे सोने की कारीगीरी जयपुर व अलवर की प्रसिद्व हैं।

राजस्थान की हस्तकलाओं से सम्बधित महत्वपुर्ण प्रश्न

Also Check –

Rajasthan GK Notes  राजस्थान जीके नोट्स इन हिन्दी

राजस्थान के लोक-नाट्य

Similar Questions – 

Q. 1 Handicrafts of Rajasthan in Hindi
Q. 2 Rajasthan Handicrafts GK
Q. 3 Information on Hastkala in Hindi – राजस्थान की हस्तकलाओं की जानकारी
Q. 4 Essay on Hastkala in Hindi – राजस्थान की हस्तकला पर निबंध
Q. 5 Rajasthan ki Lok Kala – राजस्थान की लोक कला
Q. 6 Hastshilp Kala in Hindi – हस्तशिल्प कला हिंदी में
Q. 7 Rajasthan Hastkala
Q. 8 Theva Kala in Rajasthan

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *