राजस्थान की प्रमुख जनजातियाँ

भीलः-

ये अपने आपको महादेव का वंशज मानते हैं। कर्नल जेम्स टाॅड ने इनको वनपुत्र कहा था। यह राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति हैं। यह राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति हैं। भील शब्द की उत्पति वील से हुई है जिसका अर्थ है तीर-कमान होता हैं। राजस्थान में मुख्य रूप से उदयपुर जिले में निवास करती हैं।  भील जनजाति का मुख्य देवता टोटम होता है। पेड़-पौधों को टोटम का प्रतिक माना जाता हैं। भील जनजाति बाल-विवाह नहीं करते हैं। विवाह के समय दामाद से भराड़ी माता का चित्र बनाया जाता हैं। पेड़-पौधों को साक्षी मानकर भी ये लोग शादी कर लेते हैं। इसे हाथीवेण्डों विवाह कहा जाता हैं। भराड़ी माता को विवाह की देवी मानते हैं। केसरिया नाथ जी की केसर पीकर भील कभी झुठ नहीं बोलते हैं। भील जनजाति महुआ से बनी शराब अधिक पिते हैं। फाइरे-फाइरे भील जनजाति का रणघोष हैं। यदि कोई भील किसी घुड़सवार सैनिक को मार देता हैं तो उसे पाखरिया कहते हैं। स्थानांतरित कृषि को वालरा तथा पहाड़ी भागों में की जाने वाली कृषि को चिमाता कहते हैं। और समतल भाग पर कि जाने वाली कृषि को दजिया कहते हैं। भील जनजाति के लोग सामुहिक रूप से कार्य करते हैं। जिसे हेलमो कहते हैं। इनके घरों को कु या टापरा कहते हैं। तलाक देने को छेड़ा फाड़ना कहते हैं। यदि कोई महिला अपने पति को छोड़कर अन्य पुरूष के साथ रहने लग जाती है तो पहले पति को दूसरा पुरूष झगड़ा राशी देता हैं। हत्या बदले जो धन लेते हैं उसे मौताणा कहते हैं। इनके प्रमुख मेले बेणेश्वर मेला नवाटापुरा-डूगंरपुर तथा घोटिया अम्बा मेला बासवाड़ा में लगते हैं। इनका प्रसिद्व गीत हमसिढ़ो है जिसे पुरूष और स्त्री दोनों मीलकर गाते हैं। माणिक्य लाल आदिम जाति शोध संस्थान उदयपुर-भीलों की संस्कृति को बचाये रखने का कार्य करती हैं।

मीणाः-

मीणा शब्द का तात्पर्य मतस्य से हैं। ये स्वयं की उत्पति मीन भगवान से मानते हैं। राजस्थान की सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति हैं। तथा राजस्थान की सर्वाधिक शिक्षित जनजाति हैं। इनकी सर्वाधिक जनसंख्या जयपुर जिले में निवास करती हैं। इनमें मुख्यतः दो वर्ग होते हैं जमींदारा मीणा और चैकीदार मीणा। मीणाओं का प्रयागराज “रामेश्वर घाट“ सवाई माधोपुर में हैं। मोरनी माडंणा इनके विवाह की रस्म होती हैं।

कंजरः-

कंजर शब्द की उत्पति काननचार से हुई हैं। जिसका अर्थ है जंगल में विचरण करने वाला। यह घुमक्कड़ जनजाति हैं जो सर्वाधिक बोलती हैं। मुख्यतः यह जनजाति हाड़ौती क्षैत्र में निवास करती हैं।  इसका मुख्य व्यवसाय अपराध करना हैं।  ये अपराध करने से पहले देवता से आशिर्वाद माँगते हैं। जिसे पाती माँगना कहते हैं। जोगणिया माता (भीलवाड़ा) कंजरों की कुलदेवी हैं। ये चैथ माता तथा हनुमानजी को भी अराध्या देव कहते हैं। इनके घरों की पीछे की तरफ खिड़की रखना जरूरी होता हैं। हाकमराजा का प्याला पीने के बाद कंजर झूठ नहीं बोलते हैं। ये लोग मरणासन्न व्यक्ति के मुँह में शराब डालते हैं। ये लोग मोर का मांस प्रिय मानते हैं। कंजर  शव को दफनाते हैं। इनके मुखिया को पटेल कहा जाता हैं।

कथौड़ीः-

यह मूल रूप से महाराष्ट्र की जनजाति हैं। खैर के वृक्ष की छाल से कत्था बनाने के कारण ये कथौड़ी  कहलाए। राजस्थान में यह मुख्यतः उदयपुर में निवास करते हैं। कथौड़ी दूध नहीं पीते हैं। ये शराब अधिक पीते हैं। तथा महिलाएं भी इनके साथ बैठकर शराब पीती हैं। महिलाएं गहने नहीं पहनते हैं। वे टैटू (गोदना) बनवाती हैं। ये बंदर का माँस खाते हैं। इनके मुखिया को नायक कहा जाता हैं। कथौड़ी एक संकटग्रस्त जनजाति है तथा इसके 35-40 परिवार ही बचे हैं। राजस्थान सरकार इन्हें मनरेगा में विशेष लाभ देते हुए इन्हें 100 दिन का अतिरिक्त रोजगार प्रदान करती हैं। इस जनजाति की महिलाएं मराठी अंदाज में साड़ी बांधती हैं जिसे ‘फड़का‘ कहते हैं।

डामोरः-

यह जनजाति सर्वाधिक डूंगरपूर में निवास करती हैं। डूंगरपूर जिले की सीमलवाड़ा पंचायत समिती को डामरिया  क्षैत्र कहा जाता हैं। एकमात्र जनजाति जो वनों पर आश्रित न होकर बल्कि पशु-पालन व खेती करते हैं। होली के अवसर पर किया जाने वाला कार्यक्रम चाड़िया कहलाता हैं। पुरूष भी महिलाओं के भांति गहने पहनते हैं। इनके मुखिया को मुखी कहा जाता हैं। इस जनजाति में बहु विवाह प्रचलन में हैं।  दापा (वधू मूल्य) चुकाकर दुल्हन प्राप्त कर ली जाती हैं।  इस जनजाति के प्रमुख मेले छैला बावजी का मेला पंचमहल (गुजरात) और ग्यारस की रेवड़ी का मेला डूंगरपूर में लगते हैं।

सांसी-

इनकी उत्पति सांसमल नामक व्यक्ति से मानी जाती हैं। सांसी मुख्यतः भरतपुर व अजमेर जिले में निवास करते हैं। इनमें 2 प्रमुख उपजातियां बीजा व माला होती हैं। एकमात्र जनजाति जो विधवा विवाह नहीं करती हैं। भाखर बावजी की कसम खाकर सांसी कभी झुठ नहीं बोलते हैं। सिकोदरी माता इनकी मुख्य आराध्य देवी हैं। सांसी जनजाति में लड़कियों को शादी के बाद अपने चरित्र की परीक्षा देनी होती हैं जिसे कुकड़ी रस्म कहते हैं। ये चोरी को वि़द्या मानते हैं। इनमें विधवा विवाह का प्रचलन नहीं हैं। ये हरिजनों को अपने से ऊपर मानते हैं।

गरासियाः-

मीणा व भील के पश्चात गरासीया राज्य की तीसरे नम्बर की जनजाति हैं। सिरोही जिले की आबू व पिण्डवाड़ा तहसीलों में तथा उदयपुर की गोगुन्दा तहसील में तथा पाली की बाली तहसीलों में मुख्यतः निवास करती हैं।  नक्की झील को ये पवित्र स्थान मानते हैं। तथा इसमें अस्थियों का विसर्जन करते हैं। ये सफेद पशु व मोर को पवित्र मानते हैं। गरासिया महिलांए श्रृगांर प्रिय होती हैं। तथा अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती हैं। गरासिया जनजाति में प्रेम-विवाह अधिक किए जाते हैं। सियावा (सिरोही) के गणगौर मेले में अधिक प्रेम-विवाह किये जाते हैं। यदि कोई गरासिया पुरूष  किसी भील महिला से शादी कर लेता है तो उसको ‘गरासिया-भील’ कहते हैं। तथा कोई गरासिया महिला किसी भील पुरूष से शादी कर ले  तो उसे ‘गमेती-गरासिया’ कहते हैं। इनका पवित्र स्थान नक्की झील हैं। ये सर्वाधिक अंधविश्वासी होते हैं। इस जनजाति में सर्वाधिक प्रेम-विवाह होते हैं जो मेले में चुनते हैं। ये मृत्यु के 12वें दिन अंतिम संस्कार करते हैं। इनका आदर्श पक्षि मोर होता हैं।

सहरियाः-

ये जनजाति बांरा जिले की किशनगंज व शाहबाद तहसीलों में मुख्यतः निवास करती हैं। राजस्थान की एकमात्र जनजाति जिसे ‘आदिम-जनजाति’ का दर्जा प्राप्त हैं। इनका मुखिया कोतवाल कहलाता हैं। इनमें मृतक का श्राद नहीं किया जाता हैं। दहेज प्रथा भी प्रचलीत नहीं हैं। महिलाएं घर में पर्दा रखती हैं। लेकिन घर के बाहर नहीं रखती हैं। इनकों भी मनरेगा में 100 दिन का अतिरिक्त रोजगार प्राप्त हैं। इनके महिलाएं तो टैटू बनवा सकती हैं। लेकिन पुरूषों की मनाही हैं। इनकी 84 गाँवों की पंचायत बारां सीताबाड़ी के वाल्मीकी मंदिर में होती हैं। ये वाल्मीकी को आदिपुरूष मानते हैं। कोड़िया माता इनकी कुलदेवी हैं।  दीपावली  पर हिड़ गाने की परंम्परा हैं। ये होली पर लठमार होली खेलते हैं। ये पेड़ों पर घर बनाकर भी रहते हैं। जिसे गोपना या टोपा कहते हैं। धारी संस्कार का सम्बन्ध सहरिया जनजाति से हैं।

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Q. 7 कंजर जनजाति – Kanjar Janjati
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